Shrimad Bhagwad Geeta
Shrimad Bhagwad Geeta Ch. 17 [11-13]
अध्याय 17: श्रद्धात्रयविभागयोग
सात्त्विक यज्ञ
मूल श्लोक · 17.11
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते । यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ।। 11 ।।
व्याख्या
जो यज्ञ फल की इच्छा से रहित शास्त्र विधि के अनुसार है, कर्तव्य भावना और एकाग्र मन के साथ किया गया है, वह सात्त्विक यज्ञ कहलाता है ।
विशेष
- फल की आसक्ति से रहित होकर किए जाने वाले यज्ञ को कौनसा यज्ञ कहते हैं ? उत्तर है - सात्त्विक यज्ञ ।
- सात्त्विक यज्ञ में किस विधि का पालन किया जाता है ? उत्तर है - शास्त्र विधि का ।
राजसिक यज्ञ
मूल श्लोक · 17.12
अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् । इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ।। 12 ।।
व्याख्या
लेकिन हे भरत श्रेष्ठ अर्जुन ! जो यज्ञ प्रदर्शन अथवा दिखावे के लिए और फल प्राप्ति की इच्छा से किया जाता है, तुम उसे राजसिक यज्ञ जानो ।
विशेष
- राजसिक यज्ञ किस उद्देश्य से किया जाता है ? उत्तर है - दिखावे और फल प्राप्ति की इच्छा से ।
तामसिक यज्ञ
मूल श्लोक · 17.13
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् । श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ।। 13 ।।
व्याख्या
जो यज्ञ शास्त्र विधि को त्यागकर, बिना अन्न दान के, बिना मन्त्र के, बिना दक्षिणा के और श्रद्धाभाव से रहित होकर किया जाता है, वह तामसिक यज्ञ कहलाता है ।
विशेष
तामसिक मनुष्य यज्ञ को किस प्रकार करते हैं ? उत्तर है - शास्त्र विधि से रहित, अन्न रहित, मन्त्र रहित, दक्षिणा रहित और श्रद्धा रहित होकर ।