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Shrimad Bhagwad Geeta

Shrimad Bhagwad Geeta Ch. 11 [10-14]

अध्याय 11: विश्वरूपदर्शनयोग

मूल श्लोक · 11.10

अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम्‌ । अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्‌ ।। 10 ।।

मूल श्लोक · 11.11

दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम्‌ । सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम्‌ ।। 11 ।।

व्याख्या

योगेश्वर श्रीकृष्ण का वह दिव्य स्वरूप अनेक मुख और नेत्रों वाला, अनेक अद्भुत दर्शनों वाला, अनेक दिव्य आभूषणों अथवा अलंकारों वाला, अनेक दिव्य अस्त्रों वाला-

दिव्य माला और वस्त्रों वाला, दिव्य सुगन्धित लेपों वाला, सभी आश्चर्यों वाला व  सभी दिशाओं की ओर मुख रखने वाला तथा अनन्त स्वरूप वाला था अर्थात् अनन्त स्वरूप से युक्त था ।

हजारों सूर्यों का प्रकाश = महापुरुष के शरीर का प्रकाश

मूल श्लोक · 11.12

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता । यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ।। 12 ।।

व्याख्या

यदि आकाश में हजारों सूर्यों का प्रकाश एक साथ प्रकाशित हो उठे, तो वह प्रकाश शायद ही उस महापुरुष ( भगवान् श्रीकृष्ण ) के शरीर के प्रकाश के बराबर हो पाये ।

मूल श्लोक · 11.13

तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा । अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ।। 13 ।।

व्याख्या

इस प्रकार पाण्डव पुत्र अर्जुन ! ने अनेक भागों में विभक्त हुए उस सम्पूर्ण जगत् को भगवान् श्रीकृष्ण के शरीर में एक ही स्थान पर स्थित अथवा सिमटा हुआ देखा ।

मूल श्लोक · 11.14

ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः । प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ।। 14 ।।

व्याख्या

तब रोमांचित व आश्चर्यचकित हुए अर्जुन ने भक्ति भाव से अपना सिर झुकाकर एवं हाथ जोड़कर उस देवता को प्रणाम करते हुए कहा -

Reader discussion

Comments (4)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Anshu

    Prnam Aacharya ji . Sunder. Thank you

  2. Savita singh

    Best explain sir ????????

    Thank you sir ????

  3. Tinku Pahal

    बहुत-बहुत आभार गुरुजी

  4. Aashish malhan

    Nice explain about bhagwan Krishna guru Ji.