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Shrimad Bhagwad Geeta

Shrimad Bhagwad Geeta Ch. 1 [22-25]

अध्याय 1: अर्जुनविषादयोग

मूल श्लोक · 1.22

यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्‌ । कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥ 22 ।।

मूल श्लोक · 1.23

योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः । धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः ॥ 23 ।।

व्याख्या

जिससे मैं यहाँ पर युद्ध की इच्छा से आये हुए योद्धाओं को अच्छी प्रकार से देख लूँ कि मुझे किन- किन योद्धाओं के साथ युद्ध करना है ।

इसके साथ ही मैं उन लोगों को भी अच्छी प्रकार से देख लूँ जोकि दुर्बुद्धि ( बुरी बुद्धि ) दुर्योधन का हित ( भला ) चाहने वाले कौन- कौन से योद्धा युद्ध के लिए यहाँ पर इकठ्ठे हुए हैं ।

संजय उवाच

मूल श्लोक · 1.24

एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत । सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्‌ ॥ 24 ।।

व्याख्या

संजय कहता है हे धृतराष्ट्र ! इस प्रकार गुडाकेश ! ( निद्रा व तन्द्रा पर विजय प्राप्त करने वाला ) हृषीकेश ! ( इन्द्रियों का स्वामी अथवा इन्द्रियों पर नियंत्रण रखने वाला ) श्रीकृष्ण ने अर्जुन के उत्तम रथ को दोनों सेनाओं के बीच में ले जाकर खड़ा कर दिया ।

विशेष

यहाँ पर गुडाकेश व हृषीकेश दोनों ही शब्द श्रीकृष्ण के लिए प्रयोग किये गए हैं । जिनका अर्थ ऊपर व्याख्या में बता दिया गया है ।

मूल श्लोक · 1.25

भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्‌ । उवाच पार्थ पश्यैतान्‌ समवेतान्‌ कुरूनिति ॥ 25 ।।

व्याख्या

अब श्रीकृष्ण अर्जुन के रथ को भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य व अन्य सभी राजाओं के सामने खड़ा करके कहते हैं कि हे पार्थ ! यहाँ युद्ध की इच्छा से इकठ्ठे हुए सभी कौरवों को देखो ।

Reader discussion

Comments (4)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Anshu

    Prnam Aacharya ji…. Sunder…. Dhanyavad….om

  2. Mamta

    Thank you sir

  3. रोहित कुमार

    अतिउत्तम व्याख्यान…….sir…..

  4. Aashish malhan

    Nice explain dr sahab.