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Shrimad Bhagwad Geeta

Shrimad Bhagwad Geeta Ch. 1 [17-21]

अध्याय 1: अर्जुनविषादयोग

मूल श्लोक · 1.17

काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः । धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥ 17 ।।

मूल श्लोक · 1.18

द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते । सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान्दध्मुः पृथक्पृथक्‌ ॥ 18 ।।

व्याख्या

इसके बाद श्रेष्ठ धनुर्धर काशिराज, महारथी शिखण्डी, सेनापति धृष्टद्युम्न, राजा विराट, कभी भी पराजित न होने वाले सात्यिक, राजा द्रुपद, द्रौपदी के पाँचों पुत्रों व सुभद्रा के पुत्र वीर अभिमन्यु ने भी युद्ध के लिए चारों ओर से अपने- अपने शंख बजाये ।

मूल श्लोक · 1.19

स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्‌ । नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्‌ ।। 19

व्याख्या

इन सभी शंखों से उत्पन्न भयानक घोष ( ध्वनि ) ने पूरी पृथ्वी और आकाश को गुँजाते हुए धृतराष्ट्र के सभी पुत्रों के हृदय को विदीर्ण अर्थात् दिल को दहलाने या फाड़ने वाली ध्वनि पैदा कर दी ।

विशेष

पाण्डवों द्वारा बजाये गए सभी शंखों से इतनी भयंकर ध्वनि उत्पन्न हुई कि पूरी पृथ्वी और आकाश गुँजने लगा । यह ध्वनि इतनी भयानक थी जिसने धृतराष्ट्र के सभी पुत्रों के दिलों को भी दहला दिया था ।

मूल श्लोक · 1.20

अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्‌ कपिध्वजः । प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥ 20 ।।

मूल श्लोक · 1.21

हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते । अर्जुन उवाच सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥ 21 ।।

व्याख्या

अब संजय कहता है कि हे राजन् धृतराष्ट्र ! इसके बाद कपिध्वज ( कपि की आकृति लगे झंडे वाला रथ ) अर्जुन शस्त्र प्रहार के लिए तैयार खड़ी कौरव सेना के सामने अपने धनुष को उठाकर श्रीकृष्ण को कहता है कि हे अच्युत ! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में ले जाकर खड़ा कर दीजिए ।

Reader discussion

Comments (5)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Alok kumar Patwa

    ॐ गुरुदेव!

    आपका हृदय से आभार।

  2. Mamta

    Thank you sir

  3. Anshu

    Prnam Aacharya ji…. Dhanyavad

  4. Aashish malhan

    Nice guru ji.

  5. Kr Rohit

    अतिसुन्दर गुरुदेव …….