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Shrimad Bhagwad Geeta

Shrimad Bhagwad Geeta Ch. 8 [18-21]

अध्याय 8: अक्षरब्रह्मयोग

मूल श्लोक · 8.18

अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ।। 18 ।।

विशेष

जब ब्रह्मा का दिन प्रारम्भ होता है, तब यह सभी व्यक्त ( दिखाई देने वाले ) पदार्थ उस अव्यक्त ( प्रकृति ) से ही उत्पन्न होते हैं और रात्रि के समय पहले की भाँति सभी व्यक्त पदार्थ जो अव्यक्त से उत्पन्न हुए थे, वह वापिस उसी अव्यक्त में विलीन हो जाते हैं ।

विशेष

ब्रह्मा के दिन का तात्पर्य ब्रह्मा के जागने के समय से और रात्रि का ब्रह्मा के सोने के समय से है । ब्रह्मा के दिन को कल्प कहते हैं । यह परीक्षा में उपयोगी हो सकता है ।

मूल श्लोक · 8.19

भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते । रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ।। 19 ।।

व्याख्या

हे पार्थ ! प्राणियों का पूरा समुदाय कर्म बन्धन से बन्धकर बार- बार ब्रह्मा के दिन जन्म लेता है और ब्रह्मा की रात्रि के समय उसी में विलीन हो जाता है ।

मूल श्लोक · 8.20

परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः । यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ।। 20 ।।

व्याख्या

परन्तु उस अव्यक्त ( मूल प्रकृति ) से भी उत्कृष्ट अथवा ऊँची सनातन परब्रह्मा की स्थिति है, जो सभी प्राणियों के समूहों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होती है अर्थात् जिसका कभी अन्त नहीं होता ।

मूल श्लोक · 8.21

अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्‌ । यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ।। 21 ।।

व्याख्या

अव्यक्त, अक्षर और परमगति आदि जो शब्द हैं, वह सभी परब्रह्म परमात्मा के लिए ही कहे गए हैं ।  जिनको ( अव्यक्त, अक्षर व परमगति ) प्राप्त करने के बाद मनुष्य का पुनर्जन्म नहीं होता है अर्थात् वह दोबारा जन्म नहीं लेता है, वही मेरा परमधाम अथवा स्थान है ।

Reader discussion

Comments (4)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Nisha bhardwaj

    Thanku sir ????

  2. Aashish malhan

    Guru ji nice explain about parbahrama.

  3. Savita Singh

    Thank you sir ????????????????????????

  4. Alok kumar Patwa

    ओम् गुरुदेव!

    आपका हृदय से परम आभार प्रेषित करता हूं।