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Shrimad Bhagwad Geeta

Shrimad Bhagwad Geeta Ch. 7 [1-3]

अध्याय 7: ज्ञानविज्ञानयोग

अध्याय परिचय

सातवां अध्याय ( ज्ञान- विज्ञान योग )

सातवें अध्याय में योगीराज श्रीकृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि इस ब्रह्म ज्ञान को जानने के बाद कोई भी ऐसा ज्ञान शेष नहीं बचता है, जिसे जानना जरूरी हो ।

इस अध्याय में कुल तीस ( 30 ) श्लोकों का वर्णन किया गया है । जिसमें परब्रह्ना की मुख्य आठ प्रकार की प्रकृति ( पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार ) का वर्णन किया है । इसे प्रकृति की अपरा श्रेणी कहा गया है । इसके अलावा प्रकृति की परा श्रेणी का भी वर्णन किया गया है । अपरा को निम्न व परा को उच्च श्रेणी में रखा गया है साथ ही सभी प्राणियों की उत्पत्ति का आधार भी अपरा व परा प्रकृति को ही माना गया है ।

इसके अतिरिक्त इस अध्याय में भक्त के चार प्रकारों का भी वर्णन किया गया है, जो कि अत्यंत महत्वपूर्ण है ।

गीता के अनुसार इस संसार में चार प्रकार के भक्त होते हैं-  ‘चतुर्विधा भजन्ते मां जना: सुकृतिनोऽर्जुन’ अर्थात् चार प्रकार के भक्त मेरा भजन करते हैं :- 1. आर्त , 2. अर्थार्थी, 3. जिज्ञासु, और 4. ज्ञानी । इन सभी भक्तों में से सबसे प्रिय भक्त के विषय में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ‘प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रिय:’ अर्थात् इनमें से मुझे ज्ञानी भक्त सबसे ज्यादा प्रिय है । इसके साथ ही वह आर्त भक्त को सबसे निकृष्ट भक्त मानते हैं ।

श्रीभगवानुवाच

मूल श्लोक · 7.1

मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः । असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ।। 1 ।।

मूल श्लोक · 7.2

ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः । यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ।। 2 ।।

व्याख्या

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं - हे पार्थ ! तुम मुझमें आसक्त होकर, श्रद्धापूर्वक मेरा आश्रय लेकर, जिस योग विधि का अभ्यास करके बिना किसी सन्देह के मुझे सम्पूर्ण रूप से जान पाओगे, अब उसे सुनो ।

अब मैं तुम्हें इस ज्ञान को सम्पूर्ण विज्ञान के साथ कहूँगा अथवा बताऊँगा, जिसे जानने के बाद इस संसार में अन्य कुछ भी जानने की आवश्यकता नहीं रहती ।

विशेष

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को स्वयं ( ब्रह्मा ) को जानने के लिए  उचित योग विधि सुनने की बात कहते हैं । जिसको जानने के बाद अन्य कुछ भी जानने योग्य नहीं रहता ।

मूल श्लोक · 7.3

मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये । यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्वतः ।। 3 ।।

व्याख्या

हजारों मनुष्यों में से कोई विरला ( एक- आध ) ही सिद्धि प्राप्त करने का प्रयत्न करता है और उन सिद्धि प्राप्त करने वालों ( अनेकों ) में से भी कोई विरला ही मेरे वास्तविक स्वरूप को जान पाता है अर्थात् मुझे तत्त्व रूप में जान पाता है ।

विशेष

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि हजारों लोगों में से कोई एक- आध ही योग में सिद्धि प्राप्त करने की कोशिश करता है और उनमें से भी कोई एक- आध ही मेरे वास्तविक स्वरूप को जान पाता है ।

उदाहरण स्वरूप :-

जिस प्रकार लाखों- करोड़ों युवाओं में से कुछ युवा ही सेना में अधिकारी बनने का प्रयत्न करते हैं और उन हजारों में से भी कुछ ( गिने - चुने ) ही अधिकारी बन पाते हैं तथा उन अधिकारियों में से कोई एक - आध ही सेना प्रमुख ( आर्मी चीफ ) बन पाता है । ठीक इसी प्रकार भगवान के वास्तविक स्वरूप को भी कोई विरला ही समझ पाता है ।

Reader discussion

Comments (3)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Savita Singh

    Thank you sir ????????

  2. Aashish malhan

    Guru ji nice explain about gayani bagata.

  3. Sonika

    Thanks sir