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Shrimad Bhagwad Geeta

Shrimad Bhagwad Geeta Ch. 4 [1-3]

अध्याय 4: ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

अध्याय परिचय

चौथा अध्याय ( ज्ञान - कर्म सन्यासयोग )

चौथे अध्याय में मुख्य रूप से कर्म व ज्ञान का उपदेश दिया गया है ।

इसमें कुल बयालीस ( 42 ) श्लोकों का वर्णन किया गया है ।

इस अध्याय के आरम्भ में ही श्रीकृष्ण योग की पुरातन परम्परा का परिचय देते हुए कहते हैं कि यह कर्मयोग का मार्ग कभी भी नष्ट नहीं हो सकता । यह तीनों लोकों में विद्यमान रहने वाला सनातन ज्ञान है । यह योगज्ञान मेरे द्वारा सबसे पहले विवस्वान को दिया गया, विवस्वान ने अपने पुत्र मनु को, मनु ने अपने पुत्र इक्ष्वाकु को दिया । इसके बाद अनेक राजऋषियों ने इस ज्ञान को प्राप्त किया । कुछ काल पहले यह ज्ञान लुप्तप्राय हो गया था, जिसे मैं आज फिर से तुम्हे बताऊँगा । इस प्रकार ऊपर वर्णित वैदिक योग परम्परा के इतिहास को बताया गया है ।

जब अर्जुन पूछते हैं कि हे कृष्ण ! तुम्हारा जन्म तो अभी हुआ है और विवस्वान का जन्म बहुत पहले हो चुका, तो यह कैसे सम्भव है कि उस समय भी यह ज्ञान तुमने ही दिया था ? इसके उत्तर में श्रीकृष्ण गीता के बहुत ही प्रचलित श्लोक ‘यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत’ का उपदेश देते हुए कहते हैं कि हे अर्जुन ! जब - जब धर्म की हानि होती है तब- तब मैं स्वयं प्रकट होकर उसकी रक्षा करता हूँ । इसलिए आज लुप्तप्राय हो चुकी इस योगविद्या को पुनर्जीवित करने के लिए मैं स्वयं आया हूँ ।

इस अध्याय में श्रीकृष्ण चार वर्णों ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र ) का भी वर्णन करते हैं ।

प्राणायाम की विधि का वर्णन करते हुए कहा है कि प्राण का अपान व अपान का प्राण में हवन करना ही प्राणायाम होता है ।

इनके अतिरिक्त इस अध्याय में कर्म व अकर्म का स्वरूप, ज्ञान की महिमा, ज्ञान से मुक्ति प्राप्ति व पापनाश के उपायों का भी वर्णन किया गया है ।

वैदिक योग परम्परा का क्रम · श्री भगवानुवाच

मूल श्लोक · 4.1

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्‌ । विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्‌ ।। 1 ।।

व्याख्या

भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कहा कि कभी भी नष्ट न होने वाले इस कर्मयोग के ज्ञान को मैंने सबसे पहले विवस्वान अर्थात् सूर्य को बतलाया । विवस्वान ने यह योग ज्ञान अपने पुत्र मनु को व मनु ने कर्मयोग का यह ज्ञान अपने पुत्र इक्ष्वाकु को दिया ।

मूल श्लोक · 4.2

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः । स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ।। 2 ।।

व्याख्या

हे परन्तप अर्जुन ! इस प्रकार वंश परम्परा से प्राप्त होने वाले कर्मयोग के इस ज्ञान को अनेक राजऋषियों ने अपने पूर्वजों से सीखा और जाना, परन्तु कालान्तर ( समय के बीतने से ) के प्रभाव से यह कर्मयोग लुप्तप्राय ( लगभग समाप्त ) हो गया था ।

विशेष

ऊपर उल्लेखित दोनों ही श्लोक परीक्षा व ज्ञान की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं । इनके सम्बन्ध में यह पूछा जा सकता है कि योग परम्परा के सही क्रम को व्यवस्थित करिये, जिसका सही क्रम इस प्रकार है :- श्रीकृष्ण > विवस्वान ( सूर्य ) > मनु > इक्ष्वाकु > राजऋषि > अर्जुन

मूल श्लोक · 4.3

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः । भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्‌ ।। 3 ।।

व्याख्या

क्योंकि तुम मेरे भक्त व सखा ( मित्र ) हो, इसलिए सभी रहस्यों में उत्तम इस पुरातन कर्मयोग के ज्ञान को आज मैंने तुमसे कहा है।

Reader discussion

Comments (4)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Alok kumar Patwa

    ॐ गुरुदेव!

    आपका बहुत बहुत आभार।

  2. Tinku Pahal

    Thanks guru ji

    ?????

  3. Aashish malhan

    Dr sahab nice explain about karma yoga knowledge deliever.

  4. Anshu

    Prnam guru Ji .thank you