Shrimad Bhagwad Geeta
Shrimad Bhagwad Geeta Ch. 15 [17-20]
अध्याय 15: पुरुषोत्तमयोग
उत्तम पुरुष = ईश्वर ( परमात्मा )
मूल श्लोक · 15.17
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ।। 17 ।।
व्याख्या
इन दोनों पुरुषों से भिन्न उस उत्तम पुरुष को परमात्मा कहते हैं, जो तीनों लोकों में प्रवेश करके उनका पोषण करता है, उसी अविनाशी पुरुष को ईश्वर कहते हैं ।
पुरुषोत्तम ( ईश्वर ) नाम से प्रसिद्ध
मूल श्लोक · 15.18
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः । अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ।। 18 ।।
व्याख्या
मैं क्षर ( शरीर ) से भी अतीत ( पुराना ) और अक्षर ( आत्मा ) से भी उत्तम ( श्रेष्ठ ) हूँ, इसलिए इस लोक और वेदों में मैं पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ ।
विशेष
- ईश्वर इस लोक और वेदों में किस नाम से प्रसिद्ध हैं ? उत्तर है - पुरुषोत्तम नाम से ।
मूल श्लोक · 15.19
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् । स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ।। 19 ।।
मूल श्लोक · 15.20
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ । एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ।। 20 ।।
व्याख्या
हे भारत ! ( अर्जुन ) जो भी ज्ञानी पुरुष मुझे पुरुषोत्तम रूप में जानता है, वह सर्वज्ञ ( सबकुछ जानने वाला ) सभी प्रकार से मुझे ही भजता है अर्थात् वह सबकुछ जानने वाला सभी प्रकार से मेरा ही भजन करता है ।
हे निष्पाप भारत ! ( अर्जुन ) इस प्रकार यह गुप्त से भी गुप्त रहस्यों वाले अति गोपनीय शास्त्र का वर्णन मेरे द्वारा किया गया है । इस ज्ञान को तत्त्वपूर्वक जानने से मनुष्य बुद्धिमान और कृतार्थ ( प्रसन्न अथवा सन्तुष्ट ) हो जाता है ।
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