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Shrimad Bhagwad Geeta

Shrimad Bhagwad Geeta Ch. 13 [7-11]

अध्याय 13: क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग

ज्ञान के तत्त्व

मूल श्लोक · 13.7

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्‌ । आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ।। 7 ।।

मूल श्लोक · 13.8

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्‍कार एव च । जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्‌ ।। 8 ।।

मूल श्लोक · 13.9

असक्तिरनभिष्वङ्‍ग: पुत्रदारगृहादिषु । नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ।। 9 ।।

मूल श्लोक · 13.10

मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी । विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ।। 10 ।।

मूल श्लोक · 13.11

अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्वज्ञानार्थदर्शनम्‌ । एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ।। 11 ।।

व्याख्या

अभिमान ( अहमभाव ) का अभाव, दम्भाचरण ( झूठे आचरण ) का अभाव, अहिंसा, क्षमा, सरलता, आचार्यों की उपासना, शुद्धि, स्थिरता, आत्म संयम -

इन्द्रियों की विषय - भोगों से विमुखता, अहंकार का अभाव और जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा व व्याधि ( बीमारी ) आदि दुःख व दोषों को देखना -

पुत्र, पत्नी व घर आदि से विरक्ति अर्थात् इन सबमें आसक्ति का अभाव, इष्ट व अनिष्ट ( अनुकूल व प्रतिकूल ) दोनों ही स्थितियों में अपने चित्त को समभाव से युक्त रखना -

मेरे प्रति ( ईश्वर में ) अनन्य भक्ति भाव रखना, जहाँ पर ज्यादा लोग रहते हो वहाँ रहने में अरुचि व एकान्त स्थान में रहने में रुचि का भाव -

आध्यात्मिक ज्ञान की स्थिति में रहते हुए सदा तत्त्वज्ञान के वास्तविक अर्थ को देखना की प्रवृति का भाव ; ऊपर वर्णित सभी कथनों को ज्ञान कहते हैं और इनके अतिरिक्त अथवा विपरीत जो भी है, वह सब अज्ञान है ।

विशेष

ऊपर वर्णित ज्ञान के सभी तत्त्व महत्वपूर्ण हैं, अतः परीक्षार्थी इन सबको अच्छे से याद करें ।

Reader discussion

Comments (3)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Aashish malhan

    Nice guru ji about gayana tatva.

  2. Savita singh

    Very best explain sir ????????

  3. Anshu

    Prnam Aacharya ji. ????Sunder. Bhut Dhanyavad