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Shrimad Bhagwad Geeta

Shrimad Bhagwad Geeta Ch. 10 [15-18]

अध्याय 10: विभूतियोग

मूल श्लोक · 10.15

स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम । भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ।। 15 ।।

व्याख्या

हे सभी प्राणियों के उत्पत्तिकर्ता ! हे प्राणियों के स्वामी ! हे देवों के देव ! हे जगत् के स्वामी ! हे पुरुषोत्तम ! आप स्वयं ही स्वयं को जानते हो, कोई अन्य आपको नहीं जानता ।

मूल श्लोक · 10.16

वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः । याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ।। 16 ।।

व्याख्या

अतः हे भगवन् ! जिन दिव्य विभूतियों के द्वारा आप इस लोक में पूरी तरह से व्याप्त हो, आप स्वयं ही उनका वर्णन कर सकते हो, कोई अन्य नहीं । इसलिए आप ही उन विभूतियों का वर्णन करो ।

मूल श्लोक · 10.17

कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्‌ । केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ।। 17 ।।

व्याख्या

हे योगेश्वर ! आप मुझे बताइये कि मैं किस रूप में आपका निरन्तर चिन्तन करते हुए आपको पहचानूँ ? और हे भगवन् ! साथ ही यह भी बताइये कि मैं किन- किन भावों अथवा रूपों में आपका चिन्तन करूँ ?

मूल श्लोक · 10.18

विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन । भूयः कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्‌ ।। 18 ।।

व्याख्या

हे जनार्दन ! ( कृष्ण ) आप अपनी विभूति और योग शक्ति का विस्तार पूर्वक वर्णन करिये, क्योंकि आपके द्वारा कहे गए अमृत वचनों से मुझे सन्तुष्टि नहीं मिल रही ।

Reader discussion

Comments (1)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Savita singh

    Yhi questions sir mere bhi mn me aaya hai

    ????????